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"क्या हमारे बुजुर्ग #Google से कम बड़े मौसम विज्ञानी रहे हैं"

महुए के पेड़ को देखकर आदिवासी बुजुर्ग मौसम के पूर्वानुमान की बात बड़े रोचक तरीके से बताते हैं। जिस साल गर्मियों में महुए के पेड़ पर खूब सारी पत्तियों को देखा जाता है यानी जब महुआ गर्मियों में हराभरा दिखता है तो अनुमान लगाया जाता है कि उस साल मानसून बहुत अच्छा रहेगा। गर्मियों में बांस की पत्तियों में हरियाली या हरापन देखा जाना मानसून के हिसाब से बुरी खबर लाता है यानी उस साल सूखा पड़ने जैसे हालात होने की संभावनांए होती है और बांस में हरियाली उस क्षेत्र में बची कुची फसलों पर चूहों के आक्रमण की अगाही भी करती है। बेर के पेड़ पर फलों की तादाद लदालद हो तो #पातालकोट घाटी के बुजुर्ग आदिवासी मानते हैं कि उस वर्ष मानसून सामान्य रहने की संभावना है। दूर्वा या दूब घास गर्मियों में खूब हरी भरी दिखायी दे तो माना जाता है कि आने वाला मानसून सामान्य से बेहतर या ज्यादा होता है। ग्रामीण इलाकों में गर्मियों में दूब घास को हरा भरा देख लोग वैसे ही खुशी मनाते हैं। कई इलाकों में लोग मानते हैं कि गर्मियों में पीपल के पेड़ पर हरियाली यानी खूब सारी पत्तियों दिखायी दे तो संतुलित या सामान्य मानसून आता है। ग्रामीण अंचलों में पीपल में हरियाली देख महिलाएं बेहतर मानसून की उम्मीद रखते हुए इसकी पूजा पाठ भी करती हैं।

गर्मियों में एक बार कच्छ (#गुजरात) के जाम कुनरिया और कोटे गाँव की तरफ रुख किया, जहाँ आमिर खान की 'लगान' फ़िल्म के गाँव का सेट बना था। यहीं मैनें एक गुर्जर बुजुर्ग से काफी देर बातचीत करी। ये गड़रिया अपनी भेड़ों को एक खेत में चरा रहा था। बातों ही बातों में उस बुजुर्ग ने यह बताकर सन्न कर दिया कि कच्छ में इस बार लगान फ़िल्म जैसे सूखे जैसे हालात बन सकते हैं। उनका लॉजिक था कि खिजड़ा (बबूल की प्रजाति का एक घना फैला पेड़) गर्मियों में ज्यादा हराभरा दिखायी दे, पत्तियों और शाखाओं की इतनी वृद्धि हो जाए कि वे जमीन को छूने लगे तो मान लिया जाना चाहिए कि सूखे के हालात बनने बनने वाले हैं, अकाल की भी नौबत आ सकती है। ये पारंपरिक जानकारी उस इलाके में बेहद प्रचलित है। तस्वीरों में से एक में वो खेत भी दिख रहा है जो भुवन और ब्रिटिशर्स के लिए क्रिकेट के मैदान में तब्दील किया गया था । दूर दिख रहे उस टीले पर जनता बैठकर लगान वाले आईकॉनिक क्रिकेट मैच का आनंद ले रही थी। मुद्दे की बात ये कि उस बरस वाकई कच्छ सूखा ही रह गया था ।

वापस आ जाएं टॉपिक पर #मध्यप्रदेश के अनेक आदिवासी क्षेत्रों में मान्यता है कि कवीट (कैथा) के पेड़ पर गर्मियों में फल लद जाएं तो आने वाला मानसून जबर्दस्त तूफानी होता है और लगातार कई दिनों तक बरसात का सिलसिला